नई दिल्ली
अगर आपने भी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करा रखा है, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कई लोग मानते हैं कि FD सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प है, लेकिन अगर बैंक ही मैच्योरिटी के बाद आपकी रकम लौटाने में आनाकानी करे तो क्या होगा? ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी 5 लाख रुपये की FD की रकम पाने के लिए लगभग 11 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। आखिरकार, अदालत ने बैंक को कड़ी फटकार लगाते हुए न केवल पूरी रकम लौटाने, बल्कि 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया।
यह मामला केरल के त्रिशूर निवासी सेतुमाधवन का है। उन्होंने बैंक में 5 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी, जिसकी मैच्योरिटी 2 जून 2015 को पूरी हो गई थी। जब वे अपनी जमा राशि लेने बैंक पहुंचे, तो बैंक ने तकनीकी कारणों का हवाला देकर भुगतान करने से इनकार कर दिया। काफी प्रयासों के बावजूद जब पैसा नहीं मिला, तो उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया।
उपभोक्ता आयोग ने सभी की जांच के बाद 31 दिसंबर 2021 को बैंक को आदेश दिया कि वह सेतुमाधवन को 5 लाख रुपये के साथ 12% सालाना ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा व मुकदमे का खर्च भी अदा करे। लेकिन, बैंक ने इस आदेश का पालन करने के बजाय अदालत में चुनौती देने का फैसला किया।
बैंक ने पहले केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन वह भी 825 दिन की देरी से। बैंक का तर्क था कि उस दौरान उसका प्रबंधन एक प्रशासक के अधीन था, इसलिए समय पर अपील नहीं की जा सकी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया और उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया।
इसके बाद भी बैंक पीछे नहीं हटा और मामले को हाईकोर्ट की बड़ी बेंच के सामने ले गया। इस बार बैंक ने दलील दी कि वह एक सहकारी बैंक है और इसलिए इस विवाद का निपटारा उपभोक्ता आयोग नहीं, बल्कि सहकारी समिति कानून के तहत होना चाहिए। हालांकि, 2 जून 2026 को केरल हाईकोर्ट की बड़ी बेंच ने भी बैंक की सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून लोगों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया खास कानून है और यह अन्य कानूनों के अतिरिक्त लागू होता है। इसलिए कोई भी बैंक या संस्था उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र से बच नहीं सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि जनता का पैसा रखने वाले बैंक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समय पर ग्राहकों को उनका पैसा लौटाना है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बैंक के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब बैंक खुद यह नहीं नकार रहा कि जमा राशि लौटानी है, तब केवल तकनीकी बहानों के आधार पर ग्राहक को परेशान करना बेहद निंदनीय है। अदालत ने कहा कि बैंक जैसे संस्थानों को जनता का विश्वास बनाए रखना चाहिए, न कि ग्राहकों को सालों तक न्याय के लिए भटकाना चाहिए।
हालांकि, सुनवाई के दौरान बैंक की ओर से 6 महीने का समय मांगा गया, ताकि वह भुगतान कर सके। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए बैंक को 6 महीने के भीतर पूरी राशि, 12% ब्याज और 10,000 रुपये मुआवजा देने का अंतिम मौका दिया।
यह फैसला देशभर के करोड़ों FD निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा मैच्योरिटी के बाद भी आपकी जमा राशि नहीं लौटाई जाती है, तो आप उपभोक्ता आयोग या अदालत का सहारा ले सकते हैं। अदालतों ने कई बार स्पष्ट किया है कि ग्राहकों के साथ लापरवाही करने वाले बैंकों को कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जाएगा।
एक्सपर्ट का मानना है कि यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करेगा। साथ ही यह भी साबित करता है कि उपभोक्ता अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़कर न्याय प्राप्त कर सकते हैं, भले ही उसमें थोड़ा समय क्यों न लगे।

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